Thursday, May 23, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

हालांकि 2019 में चुनाव से पहले नीतीश कुमार को अपनी जाति कुर्मी और कुशवाहा यानी 'लव-कुश' का करीब 10 फीसदी वोट भी मिलता रहा था.
लेकिन 2019 में कई वजहों से ये माना जा रहा है कि नीतीश कुमार का अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है. एक तो उनके लव-कुश फैक्टर को उपेंद्र कुशवाहा ने सेंध लगाई है. हालांकि इसमें कुशवाहा खुद बड़े पैमाने पर कामयाब नहीं हुए हैं लेकिन हर सीट पर इस वोट बैंक में बिखराव दिखा है.
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "कुशवाहा और यादवों की आपस में जमीनी स्तर पर नहीं बनती है, लेकिन इस बार कुशवाहा और यादव एकसाथ हुए हैं और इसका असर असली नतीजों पर देखने को मिलेगा."
इस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ही महागठबंधन ने भी चार कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं जनता दल यूनाइटेड ने इस बार तीन कुशवाहा उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.
नीतीश कुमार अपनी जाति के उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को केवल नालंदा में टिकट दे पाए. बिहार के चुनाव में यह इकलौता कुर्मी उम्मीदवार है. बावजूद इसके कुर्मियों का वोट नीतीश कुमार को ही मिल रहा है.
नीतीश की पार्टी ने बिहार में अपनी पार्टी की ओर से पांच अत्यंत पिछड़ी जाति के उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है. इस एक कदम से उन्होंने बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय को एक साथ रखने की कोशिश जरूर की है, वहीं महागठबंधन ने चार जगहों पर अत्यंत पिछड़ों को टिकट दिया है.
असली मुक़ाबला इसी जमात के वोट बैंक को अपने हिस्से में करना है. हालांकि इस जमात में कई लोगों का समर्थन अभी भी नीतीश कुमार के पक्ष में दिखाई पड़ता है. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल की कोशिश इसी वोट बैंक में अपना दायरा बढ़ाने की है.
इसके अलावा नीतीश कुमार को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा है, एक तो 2014 में जब वे अकेले चुनाव लड़े थे तब उन्हें कई जगहों पर मुसलमानों का वोट भी मिला था, लेकिन इस बार उनके बीजेपी के साथ होने के चलते उन्हें मुसलमानों का समर्थन मिल पाया होगा, इसमें संदेह है.
इसके अलावा बिहार में नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति भी बहुत कामयाब नहीं हुई है. एक अच्छी नीयत के साथ शुरू की गई ये योजना पूरी तरह से नाकाम हो गई. शराबबंदी के चलते बिहार की जेलों में भी बड़ी संख्या में लोग हैं.
पटना के आम मतदाता गोपाल चौधरी कहते हैं, "शराबबंदी का आलम तो यह है कि लंबी-लंबी गाड़ी में चलने वाले लोगों के गाड़ी और घर पर शराब पहुंचाई जा रही है और ग़रीब आदमी, रिक्शा ठेला चलाने वाला तुरंत में गिरफ्तार कर लिया जाता है."
नीतीश कुमार के राज्य में बिहार में बिजली, सड़क और पानी की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, ख़ासकर मध्य बिहार के हिस्सों में नीतीश ने कुछ ज़्यादा ध्यान दिया है. लेकिन शासन व्यवस्था अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
नालंदा से महागठबंधन के उम्मीदवार चंद्रवंशी अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार जी के किस सुशासन की बात आप कर रहे हैं, दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं, अपराध कहीं से कम नहीं हुआ है. लेकिन ये मीडिया को दिखता नहीं है."
इन सबके बावजूद नीतीश कुमार बिहार में बीजेपी के स्वभाविक सहयोगी नजर आते हैं. बीजेपी के महासचिव और बिहार राज्य के प्रभारी भूपेंद्र यादव कहते भी हैं, " नीतीश कुमार और बीजेपी का साथ बेहद पुराना और जमीनी स्तर पर काफी मज़बूत है." दरअसल, नीतीश कुमार की अपनी राजनीति बीजेपी से भले अलग दिखने की रही हो लेकिन उनके साथ से बीजेपी बिहार में जीत हासिल करने की स्थिति में पहुंच पाती है.
यही वजह है कि बीजेपी से जब तब नीतीश के नाराज होने की ख़बरें आती रही हों लेकिन बीजेपी अपनी ओर से नीतीश को साथ रखने में भरोसा करती है. इसके लिए पार्टी अपनी जीती हुई पांच लोकसभा की सीटें भी छोड़ देती है. क्योंकि उसे मालूम है कि बिहार में आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन को हराने के लिए उसे नीतीश कुमार का सहारा चाहिए. इसमें नीतीश कुमार का भी फ़ायदा होता रहा है.
नालंदा के युवा राजद अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "नीतीश कुमार खुद अवधिया कुर्मी हैं. उसके मतदाताओं की संख्या नालंदा में भी 15 हज़ार से ज़्यादा नहीं है. आप देखिए केवल इस वोट बैंक के सहारे वे 14 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. बीजेपी की मदद से ही तो वे इस मुकाम तक पहुंचे जहां से कुर्मी ही नहीं बल्कि अत्यंत पिछड़े समुदाय के नेता को तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है."
हालांकि 2019 के चुनाव में बीजेपी- जेडीयू गठबंधन को बढ़त मिलती है तो बिहार में नीतीश कुमार को 2020 के विधानसभा तक कोई चुनौती नहीं मिलेगी. लेकिन अगर इस चुनाव में उनकी पार्टी को कम सीटें मिलीं तो फिर उनके नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे.

Friday, April 19, 2019

تعهد المتظاهرون بالبقاء في الشوارع إلى أن تنتقل السلطة لنظام حكم مدني

جانب آخر تتحدث عنه ساشا، وهي متحولة جنسيا من ذكر إلى أنثى، وهو معاناة المتحولين جنسيا في المدرسة والجامعة والعمل بشكل يدفع بعضهم الى الانتحار. وتقول إن التحول الجنسي ليس اختيارا يريده الفرد، ولو كان اختيارا لما سار كثيرون في طريق يعرضهم لمشاكل وأزمات مع أسرهم ومع مجتمعاتهم. بل هو، حسبما تقول ساشا، المخرج من أزمة يشعر بها الفرد وهي أنه لا يطيق حياته بشكلها الحالي. وحسب تجربتها، شعرت منذ أن كان عمرها 12 عاما أنها لايمكن أن تستمر رجلا، وبدأت العلاج الهرموني في السر دون أن تخبر أسرتها عندما كان عمرها 13 عاما، وهي الآن، بعد أن تحولت الى أنثى، تشعر أنها منسجمة مع جسدها ومع هويتها.
وتبقى القضية الاساسية في ملف العلاقات المثلية والمتحولين جنسيا هو البحث عن أرضية مشتركة تضمن عدم تعرض فئة في المجتمع للاعتداء اللفظي والجسدي والتمييز من جانب، وفي نفس الوقت احترام ثقافة المجتمع وقوانينه التي تفرض قيودا على العلاقات الجنسية من جانب آخر. وهذا بلا شك مهمة صعبة في ظل تعقيدات هذا الملف وارتباطه بمجموعة كبيرة من المفاهيم الاجتماعية والسياسية والدينية.
تمت مناقشة هذا الموضوع في حلقة خاصة من برنامج نقطة حوار سجلت في العاصمة اللبنانية بيروت، في اطار موسم تجاوز الإختلافات الذي تنظمه بي بي سي. تبث الحلقة على الهواء مباشرة على شاشة وراديو بي بي سي يوم الجمعة 19 أبريل/نيسان في الساعة 16:06 بتوقيت جرينتش، وتعاد الساعة 1:06 والساعة 8:06 بذات التوقيت.
نُقل الرئيس السوداني السابق، عمر البشير، إلى سجن كوبر في الخرطوم، بعد عزله من منصبه مع استمرار الاعتصامات والاحتجاجات التي تطالب برحيل كافة رموز النظام السابق.
وعمر البشير ليس السياسي الأول الذي يُرسل إلى هذا السجن، إذ يعد كوبر بمثابة الشاهد على تاريخ السودان والمراحل السياسية التي تعاقبت عليه منذ الاحتلال البريطاني له وله حكاية طويلة في تاريخ السودان. فما هي قصته ومن هم أبرز السياسيين الذين سجنوا فيه؟
بعد سقوط الدولة المهدية (السودان)، شنت بريطانيا حملة عسكرية عليه بقيادة الجنرال هوراشيو كتشنر عام 1898 واحتلته بعد ذلك بعام في فترة حكم الخليفة عبدالله التعايشي عام 1899.
واجهت بريطانيا مقاومة من السودانيين بعد احتلالها، فأمر مسؤول بريطاني كان يدعى الجنرال كوبر، ببناء أكبر سجن لضم جميع المعارضين السياسيين والعسكريين المناهضين للوجود البريطاني.
فتم تشييد السجن على الطريقة البريطانية في العاصمة السودانية الخرطوم عام 1903، بأمر من كوبر، وبلغت مساحتها خمسة آلاف متر مربع.
وللسجن 14 قسماً، فهو يفصل المحكومين بالإعدام عن السياسيين أو الجرائم الجنائية أو الأحكام المؤبدة وغيرها من أنواع العقوبات، وهو أحد أكبر السجون في العاصمة السودانية.
إلا أن القسم السياسي لا يزال الأبرز، إذ شُيد خصيصاً لهذا الغرض، رغم تقلب السياسات الحاكمة في البلاد وتغير وجوه حكامها يساريين كانوا أو إسلاميين.
وتقول صحيفة "الراكوبة" السودانية، إن تسمية السجن على اسم كوبر كانت بسبب معاملته الإنسانية لنزلائه.
شهد سجن كوبر تاريخاً حافلا من الاعتقالات السياسية من جميع الأطراف في السودان.
ففي عام 1924، تم سجن قيادات "الحركة الوطنية" وقادة أعضاء جمعية "اللواء الأبيض" اللتين كانتا مناهضتين للاحتلال البريطاني.
تم اعتقال إسماعيل الأزهري الذي كان أول رئيس لحكومة وطنية ووزيراً للداخلية عام 1969، في فترة انقلاب مايو برئاسة جعفر النميري، الذي أصبح رئيسا للسودان في الفترة بين 1969-1985.
شهد عام 1985، أكبر عدد من الاعتقالات على يد النميري، ولكن وقف الفريق عبد الرحمن سوار الذهب إلى جانب الشعب وقاد انقلابه ضد النميري وأطلق سراح معظم المعتقلين السياسيين، لينهي حكم النميري واعتقال رموز نظامه ، كان من أبرزهم اللواء عمر الطيب.
وفي عام 1989، مرَّ السودان بانقلاب آخر برئاسة العميد عمر البشير، فاعتقل السياسيين وزجّ بهم في كوبر، وكان من أبرزهم، محمد عثمان الميرغني، زعيم الاتحاد الديمقراطي والصادق المهدي الذي كان رئيس الوزراء ورئيس حزب الأمة، وحسن الترابي الذي كان أمين عام الجبهة الإسلامية، الذي قيل إنه كان وراء تدبير الإنقلاب.
وفي 16 أبريل/نيسان 2019، اقتيد رئيس السودان السابق عمر البشير إلى كوبر بعد احتجاجات ومظاهرات السودانيين التي استمرت لشهور والتي أطاحت به وبعض من رموز نظامه، بمن فيهم اثنين من أشقائه، في الوقت الذي لا يزال فيه السودانيين مستمرين في احتجاجاتهم إلى أن تتحقق جميع مطالبهم.

Thursday, January 31, 2019

هل كان والد هتلر طفلاً غير شرعي لأب يهودي؟

رغم أن الزعيم النازي أدولف هتلر كرس الكثير من صفحات كتابه "كفاحي" لتوضيح أسباب كراهيته لليهود إلا أن باحثين وجدوا المزيد من التفسيرات الشخصية لهذا الأمر، بحسب ما ورد بصحيفة هاآرتس الإسرائيلية.
وفي هذا الإطار طرحت العديد من النظريات عن أسباب الكراهية التي حملها هتلر لليهود، والتي تراوحت بين أصله اليهودي وتسبب طبيب يهودي في آلام مبرحة لوالدته قبل وفاتها.
وقال ديفيد غرين في مقاله إن هناك رواية ثالثة عن يهودي يدعى ليوبولد فرانكنبرغ وهو بحسب محامي هتلر الشخصي الأبن الأصغر لأسرة يهودية وظفت جدة هتلر ماريا كطباخة في الوقت الذي حملت فيه بألويس.
ووفقا لشهادة محامي هتلر هانز فرانك في محاكمات نورنمبرغ في عامي 1945 و1946 أنه سمع من هتلر نفسه عام 1930 حديثا عن جذوره اليهودية.

طبيب أم هتلر

كما تتحدث رواية أخرى عن سبب كراهية هتلر لليهود وهو الطبيب إدوارد بلوخ الذي عني بوالدة هتلر كلارا هتلر قبل وفاتها متأثرة بسرطان الثدي عام 1907 عن عمر يناهز 47 عاما.
ففي ذلك الوقت لم يكن هناك علاج لمرضها ولكن الدكتور بلوخ وبإصرار من نجلها عالجها لمدة أكثر من شهر بعقار تجريبي اسمه  وهو الدواء الذي سبب لها الكثير من الألم، ولكنه لم يمد في حياتها.
ولكن الرواية الأخيرة غير منطقية لأن هتلر كان قد بعث برسالة للدكتور بلوخ عقب وفاة والدته يشكره على رعايته لها، كما استثناه من الإجراءات المشددة ضد اليهود لاحقاً حتى هاجر لأمريكا حيث توفي عام 1945.

المفتي

كان رئيس الوزراء الإسرائيلي بنيامين نتنياهو قد اقترح قبل سنوات أن هتلر استمد فكرة إبادة اليهود من مفتي القدس أمين الحسيني.
وقال ديفيد غرين في مقال بالصحيفة إنه قبل وصول هتلر للسلطة كانت هناك شائعات أنه من أصول يهودية، وهو جانب في تاريخه العائلي تعرض للكثير من التشويه.
وأضاف غرين قائلا إن والده ألويس هتلر كان طفلاً غير شرعيا. فرغم أن جدته ماريا آنا شيكلغروبر تزوجت في النهاية يوهان غورغ هايدلر وحملت اسمه إلا أن ألويس كان يبلغ من العمر 5 سنوات بالفعل لدى زواج أمه، وهي لم تكشف أبدا عن هوية الأب الحقيقي.
وثارت العديد من التكهنات حول هوية جد هتلر وتمحورت حول يوهان غورغ هايدلر نفسه وشقيقه يوهان نبوموك هايدلر الذي ترك لألويس جزءا من ضيعته.
وقال نتنياهو إن هتلر كان سيكتفي بطرد اليهود من ألمانيا ولكن الحسيني شكا من أنهم سيأتون إلى فلسطين وعندما سأله هتلر عن توصياته أجاب بأن العرب ينصحون بـ "إحراقهم".
وفي كتابه كفاحي قال هتلر إنه لم يكن يحمل أي مشاعر خاصة تجاه اليهود حتى انتقل إلى فيينا عام 1908 وبعد خسارة ألمانيا للحرب العالمية الأولى حملهم المسؤولية.
وفي ذهن هتلر فإن كل المجموعات التي اعتبرها مسؤولة عن فشل ألمانيا مثل البلاشفة والاشتراكيين والاشتراكيين الديمقراطيين باتوا في نفس القائمة مع اليهود، وتطور الأمر بالنسبة له ليأخذ بعدا عنصريا فأصبح اليهود ومجموعات مثل السلاف والغجر أدنى من العرق الآري.

Thursday, November 22, 2018

أوليفر كان أبرز المرشحين لتولي منصب رئيس بايرن ميونيخ

كشفت تقارير صحفية ألمانية، الأربعاء، أن حارس المرمى الدولي السابق أوليفر كان، أبرز المرشحين لتولي منصب رئيس نادي بايرن ميونيخ، عندما يقرر رئيسه الحالي أولي هونيس التنحي عن منصبه.
ومن المتوقع أن يعاد انتخاب هونيس (66 عاما) رئيسا لولاية جديدة في نوفمبر 2019. إلا أن صحيفة "بيلد" الواسعة الانتشار، كشفت أن كان (49 عاما)، الحارس السابق للنادي البافاري، هو المفضل من قبل هونيس لتولي مهامه خلفا له.
وسبق للحارس الألماني ذي الشخصية القوية، أن قال في تصريحات عام 2003 عندما كان لا يزال يدافع عن ألوان النادي، "لا يمكنني أن أتخيل رئيسا للنادي أفضل مني".
وكان النجم السابق لبايرن والمنتخب لوثار ماتيوس، قد اعتبر أن كان هو الشخص الأمثل لخلافة هونيس الذي أمضى نحو خمسة عقود في بايرن، من لاعب على المستطيل الأخضر الى مدير للفريق، فرئيس للنادي.
وكتب ماتيوس في صحيفة "بيلد"، إن كان "هو أحد وجوه بايرن ميونيخ، ويحمل الحمض النووي للنادي ويعرف كرة القدم (...) وواصل تثقيف نفسه حتى في الأمور المالية".
وتابع "أنا على ثقة بأنه قادر على قيادة بايرن في المستقبل".
وافق مارتن فورد البطل البريطاني في بناء الأجسا
شددت النيابة العامة السعودية على حسابها في "تويتر" على عدم جواز القبض أو توقيف أي إنسان في المملكة، إلا إذا ضبط متلبسا.
قدمت زعيمة حزب "إيي" التركي، ميرال أكشنار، لحكومة بلادها، ما وصفتها بالوصفة العلاجية لإعادة اللاجئين السوريين إلى بلادهم.
ونقلت وسائل إعلام تركية عن أكشنار قولها في اجتماع لنواب حزبها في البرلمان، مخاطبة الحكومة: "سأعطيكم وصفة علاجية من أجل ترحيل السوريين إلى بلدهم، أولا يجب وقف إعطاء الجنسية لهم، وهذا سيجعل قسما كبيرا يلجأ إلى مغادرة تركيا. والخطوة الثانية هي أن تتفقوا مع نظام الأسد".
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عودة أكثر من 780 لاجئا سوريا خلال الـ 24 ساعة الماضية
ومضت السياسية التركية المعارضة في هذا السياق قائلة: "وفّروا آلية رجوع 200 ألف سوري لبلادهم شهريّا، استخدموا قوة تركيا، امنعوا منتجات التهريب التي يبيعها أصحاب المحلات السورية".
وعلّقت صحيفة "يني شفق" منتقدة الزعيمة التركية المعارضة على هذا الموقف بقولها إن أكشنار، ربطت "ما تمر به تركيا من أزمة اقتصادية مفتعلة، بوجود السوريين في البلاد، ناسية أو متغافلة عن الجانب الإيجابي الذي قام به السوريون إزاء الاقتصاد التركي، لا سيما دعم الليرة التركية بشكل كبير".
ولفتت  الصحيفة التركية إلى أن ميرال أكشنار كانت أسست حزبها "إيي" أواخر عام 2017 عقب انشقاقها عن حزب الحركة القومية بزعامة دولت باهجلي، وأعلنت حينها الترشح  للانتخابات الرئاسية الأخ
م والذي يوصف بأكثر الأشخاص "رعبا في العالم" أو "الوحش"، على نزال مع العملاق الإيراني سجاد غريبي المعروف باسم "هالك".
ويشتهر فورد الذي يصل وزنه إلى 143 كغ بعضلاته المفتولة والوشوم العديدة على جسده.
وبعدما وقع "الوحش البريطاني" الذي يصل طوله إلى مترين عقدا مع منظمة  البولندية للفنون القتالية، وافق على نزال "هالك" الإيراني.

Tuesday, November 6, 2018

प्रशासन के ज़रिए नियंत्रण के प्रयास

दरअसल, हिंदी पट्टी में बिहार एक ऐसा क़िला बना हुआ है जिसे बीजेपी अपने बलबूते फ़तह नहीं कर पाई है. बिहार ही एक ऐसा राज्य है, जहाँ बीजेपी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है.
जानकार कहते हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्मशान और क़ब्रिस्तान का सवाल उठाकर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की और इसमें काफ़ी हद तक सफल भी रहे.
पटना में पीटीआई के ब्यूरो चीफ़ नचिकेता नारायण कहते हैं, "भाजपा बिहार में दूसरे दर्जे के प्लेयर की भूमिका में है. भाजपा चाहती है कि वो अन्य राज्यों की तरह या तो अपने बूते पर या सीनियर पार्टनर के रूप में सरकार में आए."
1989 के भागलपुर दंगों और फिर इस साल रामनवमी के आसपास हिंसा प्रभावित इलाक़ों में काम कर चुके सामाजिक कार्यकर्ता उदय कहते हैं, "ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी की टॉप लीडरशिप की भी प्लानिंग होती है. किस मुद्दे को छोड़ें, किसको पकड़ें- इन सबकी तैयारी होती है. इन्हें पता होता है कि कब गाय का मुद्दा लाना है और कब मंदिर का. एक वर्ष एक घटना घटती है, तो दूसरे वर्ष दूसरी. कभी हिंदू नववर्ष के नाम पर तो कभी रामनवमी के नाम पर. ये अलग-अलग प्रतीकों को चुनते हैं, अलग-अलग तिथियों को चुनते हैं."
केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे और भागलपुर के दंगे में भूमिका वजह से गिरफ़्तार हो चुके अर्जित चौबे ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, "भारत माँ की झाँकी इस देश में निकालने की अनुमति नहीं है, तो कहाँ है. अपने देश में हम वंदे मातरम भी नहीं गा सकते? इस देश में राम और कृष्ण का जयकारा नहीं करेंगे तो कहाँ करेंगे? भारत मां की प्रतिष्ठा विश्व में बने, इसका प्रयास चल रहा है."
एक और बात जो विहिप, आरएसएस, बजरंग दल और बीजेपी नेताओं में कॉमन है, वो है हिंदुत्व की परिभाषा, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और देश के मुसलमानों को सुधर जाने की सलाह.
अर्जित चौबे कहते हैं, "हिंदुत्व जीवन जीने का तरीक़ा है. हिंदू शब्द पर जो राजनीति शुरू हुई है, वो काफ़ी दुर्भाग्यपूर्ण है. देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है. मुसलमान भी हिंदू है. भारत माता की वंदना करना कौन मुसलमान बोलता है कि ग़लत बात है. वंदे मातरम राष्ट्रगीत भी है और संवैधानिक भी है."
भागलपुर में आरएसएस के शीर्ष अधिकारी रह चुके सुबोध विश्वकर्मा कहते हैं, "जीने की पद्धति है हिंदुत्व. मुसलमान भूतपूर्व हिंदू हैं. मुसलमानों को बताना पड़ेगा, समझना पड़ेगा कि वे हिंदू हैं. 18 करोड़ मुसलमानों को समुद्र में तो नहीं फेंक सकते. शक और हूण की तरह अपने आप में समाहित कर सकते हैं."
भागलपुर से कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा विधानसभा चुनाव में सुर्ख़ियों में रहे. उन्होंने अर्जित शाश्वत चौबे को मात दी थी. लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहे अजीत शर्मा का कहना है कि "जब-जब बीजेपी को लगता है कि उसके वोटों में कमी आ रही है और जीतने की संभावना नहीं है, वो जान-बूझकर दोनों समुदायों में आग लगाने की कोशिश करती है".
आशंका और भय आम आदमी में भी है. लोगों को लगता है कि बिहार के सियासी घमासान में कहीं आने वाले दिनों में सांप्रदायिक दरार और चौड़ी न हो जाए.
नवादा में नवरात्रि के मौक़े पर मंदिरों में भारी भीड़ है. कई जगह मुख्य सड़कों को आवाजाही के लिए बंद कर दिया गया है. मुस्लिम आबादी के बीच ऐसे ही एक मंदिर के पास अपने घर पर हमें मिले फ़ख़रुद्दीन अली अहमद.
उनकी नाराज़गी अपने सांसद गिरिराज सिंह से है. वे कहते हैं, "मैं गिरिराज सिंह से ये कहना चाहता हूँ कि वे सभी लोगों के प्रतिनिधि हैं इसलिए मुस्लिम समाज को अछूता न समझा जाए. मुस्लिम समाज को भी लेकर चला जाए. इस तरह का माहौल पैदा किया जा रहा है, मुस्लिम समाज को दरकिनार किया जा रहा है ताकि सांप्रदायिक दंगा फैले और हिंदू समाज के वोटर उनके पक्ष में हो जाएँ और वो 2019 में आराम से चुनाव जीत जाएँ."
औरंगाबाद की चिलचिलाती धूप में ग़ुस्से से लाल एक मुस्लिम युवक ख़ालिद कहते हैं, "यहाँ के लोगों से कोई शिकायत नहीं है. बाहरी लोगों ने आकर यहाँ तांडव किया. वे दंगा कराना चाहते है, हिंदू-मुसलमानों में लड़ाई करना चाहते हैं, वोट बटोरना चाहते हैं."
भागलपुर के जोगिंदर यादव मुसलमानों के खेतों में काम करते हैं और उन्हें पीड़ा है कि इन सबके बीच निर्दोष लोग पिस जाते हैं और उनके जैसे लोग रोज़गार के लिए तरस जाते हैं.
महागठबंधन को छोड़कर एनडीए में आए नीतीश कुमार की मजबूरी पर तो चर्चा है ही, साथ ही इस पर भी चर्चा है कि जब बिहार के कई ज़िले दंगे की आग में झुलस रहे थे, नीतीश कुमार ने चुप्पी क्यों साध रखी थी?
नीतीश कुमार की मजबूरी और बीजेपी की बिहार में बढ़ती महत्वाकांक्षा के बीच सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाएँ प्रदेश को किस ओर ले जा रही हैं?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्षता की छवि को बड़े ज़ोर-शोर से पेश करते हैं. राज्य में मुसलमानों को लेकर उनकी कई कल्याणकारी योजनाएँ हैं, जिनका ढोल वे गाहे-बगाहे पीटते रहते हैं, लेकिन बीजेपी नेताओं के भड़काऊ बयान और हिंदू संगठनों की सक्रियता ने उन्हें ऊहापोह में डाल रखा है.
पटना में पीटीआई के ब्यूरो चीफ़ नचिकेता नारायण कहते हैं, "जब पहली बार नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हुए, उसी समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह का आक्रामक नेतृत्व भाजपा में उभरा, उसके बाद यह बात सामने आ रही थी कि भाजपा अपने दम पर अपना फैलाव करने की कोशिश करेगी. इस बार भाजपा नीतीश की छत्रछाया में रहने में ही संतोष नहीं करेगी. वो अपना हिंदुत्व का एजेंडा बढ़ाने की कोशिश करेगी."
लेकिन नीतीश कुमार की दुविधा ये भी है कि वे अपनी धर्मनिरपेक्षता की छवि से समझौता नहीं करना चाहते और न ही मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में बीजेपी का ही दामन छोड़ने की हालत में हैं.
तो नीतीश कुमार के सामने क्या विकल्प हैं, नचिकेता नारायण कहते हैं, "नीतीश कुमार के लिए यही चारा है कि वे भाजपा के साथ बने रहें. साथ ही प्रशासन या ब्यूरोक्रेसी पर जो पकड़ है, उसके माध्यम से ऐसी घटनाओं को जहाँ तक संभव हो रोकें."

Wednesday, October 3, 2018

特朗普当选总统或给全球气候带来威胁

唐纳德·特朗普若继续坚持竞选时期的主张,那么他的当选对于气候行动,特别是气候变化谈判来说,将会是一场灾难。不过这也可能成为发展中国家——特别是中国——的机遇,有机会带领全球对抗气候变化。

如果特朗普遵守竞选承诺,那么他一上任就可能会做出如下几个举动:废除巴拉克·奥巴马的《清洁电力计划》;宣布美国退出《巴黎气候协定》;叫停削减煤炭消费的工作;降低可再生能源的财政支持力度。

11月7日到18日,一年一度的联合国气候峰会在马拉喀什召开。特朗普赢得总统竞选的消息一传到这里,美国政府代表团立即单独召开会议。现在其他国家的谈判代表和观察员都将希望寄托在奥巴马身上,希望他能够在明年1月份离任之前至少推动落实一部分过去8年做出的承诺。

值得一提的是,推翻《清洁电力计划》可能并非易事。华盛顿方面的专家表示,这样的举动很有可能会遭受挑战,而且耗时1年以上。而从全球角度来看,其他国家可能并不怎么关注《清洁电力计划》,因为这最多算是美国国内的一项环保举措。

如果特朗普真的宣布美国退出《巴黎气候协定》,那才是全球对抗气候变化行动的最大退步。从法律的角度来说,特朗普这么做的难度可能会小一点,因为美国是根据奥巴马总统的行政命令才承诺参与上述《协定》的,而作为新任总统,特朗普完全可以撤销这个命令。或者,他还可能将该《协定》提交参议院审议,他知道该动议多半会被共和党参议员驳回。
乔治·W·布什政府拒绝签署《京都议定书》后,其他发达国家的产业界向政府表示,任何限制排放的政策都将减弱他们对美国的竞争力。与此同时,发展中国家的产业界也向政府谏言,认为自己国家不应该采取气候行动,因为毕竟作为曾经全球第一大温室气体排放国的美国也没有进行减排。(注:美国目前是仅次于中国的全球第二大温室气体排放国。)布什政府的决定导致全球温室气体减排行动落后了好多年。

特朗普可能对气候变化造成哪些威胁?

科学研究已经证明,要想将全球平均温度上升控制在1.5℃范围内,全球温室气体排放就必须在2020年达到峰值。我们已经没有时间重开新一轮的气候辩论了。

其次,富裕国家承诺在2020年前每年向贫穷国家支付1000亿美元(约合6780亿人民币)的援助资金,帮助他们进行低碳转型,应对气候变化带来的各种影响。如果富裕国家失信了,那么《巴黎气候协定》也就根本无法发挥效用了。2009年哥本哈根气候峰会期间,时任美国国务卿的希拉里·克林顿做出了上述1000亿美元的资金承诺。如果特朗普因与这位竞选对手的交恶而迁怒于这一承诺,那么《巴黎气候协定》恐怕要就此陷入困境了。

至于美国国内,美国分析人士预测,由于特朗普政府很可能背弃前任政府的气候承诺,所以未来一段时间估计也将面临环境组织一系列的法庭指控。为了避免这一状况出现,另有分析人士认为特朗普可能会被建议通过“不作为”的方式来遏制绿色经济转型——比如推迟相关行政命令出台,或者干脆就不发布这样的命令。此外,相较废除环境保护署,特朗普更有可能会任命一位负责人来抑制该部门发展,并削减对该部门的财政支持,从而使其无法有效发挥作用。

不过也有环保人士认为,特朗普政府并不能彻底阻碍美国绿色经济转型的进程,因为大多数的环保行动其实都是各州政府发起的。但是这一点并不能让其他国家放心,因为毕竟跟他们打交道的始终都是美国政府。

中国:全球气候行动新的领导者?

过去这些年,发展中国家在控制温室气体排放方面付出了比工业化国家更多的努力。中国目前已经在太阳能光伏电池板、风力发电设备等全球主要环保产品市场上占据了最大的份额。

当特朗普胜选的消息传来,中国著名气候问题专家杨富强表示,现在是制定出“一带一路”战略的中国引领全球气候行动的时候了。如果南亚、东南亚和中亚地区能够对中国“一带一路”的战略意图予以更多信任的话,那么这个观点就能引起上述很多地区的共鸣。

如果美国现在真的不再为发展中国家提供绿色经济转型所需的各种财政和技术扶持,那么其中许多国家将不得不向中国求助

此前,印度已经与美国签订了一个大型太阳能双边合作计划。印度官员表示不希望该项目出现变动,但是他们希望等到美方相关政府部门人员调整之后再做最终评论。

美国环保界如何评价大选结果

多数美国环保人士都对本次选举的结果感到失望。行动援助组织政策分析师凯利·斯通认为:“气候变化已经对美国乃至全球数以百万计的人们的生活造成了巨大影响。干旱、洪水和其他各类极端天气变得越来越常见,后果也越来越严重,美国也难以幸免。这是当选总统特朗普必须要面对的一个全球性危机。”


​国际环境法中心总监卡罗尔·马菲特则表示:“最终签署和批准《巴黎气候协定》的是美国这个国家,不是总统本人。从国际法角度来看,甚至从全人类的生存角度考虑,全球各国都可以、必须而且肯定会确保美国继续遵守其气候承诺。”

如今,中国和多个新兴经济体国家已经在全球绿色增长方面占据了领导地位。任何企图复兴美国化石能源经济的行为都可能给特朗普政府带来麻烦,这不仅会导致美国丧失国际影响力,还可能招致巨大的经济损失。

美国气候行动网络策略总监蒂娜·约翰逊表示:“其实当选总统特朗普还有机会采取进一步的气候行动,向投资者表明美国将继续可再生能源转型的发展道路。中国、印度和其他竞争对手国都在竞相角逐清洁能源超级大国地位,美国肯定也是不甘落后。”

即便特朗普试图推翻奥巴马任内所取得的气候成就,他也要面对经济现状和民间社会的积极抵制。

特里·塔米宁曾在共和党人阿诺德·施瓦辛格担任加州州长期间主导完成了该州具有开创性意义的气候立法。而他认为,特朗普的许多承诺可能都无法实现,比如钢铁行业不会在匹兹堡重现辉煌,而煤炭复兴也意义不大,因为美国的火力发电厂早已开始大规模使用天然气了。

除此之外,共和党占多数的国会结构导致华盛顿政府的政治行动力陷入瘫痪,所以采取气候行动的权力其实已经下放到了各州、各地市以及行业内部。而且投资者们也明白,全球经济去碳化才是未来的发展方向。

气候变化机构投资者集团首席执行官斯蒂芬妮·法菲尔表示:“全球经济已经经历了不可逆转的变迁,而这种变迁的速度和规模令人惊叹:比如,可再生能源已经取代煤炭成为了全球主要的电力来源,电动汽车的市场份额迅速攀升,而清洁能源领域的就业机会也出现了前所未有的增长。此外,这种转变在美国经济中也变得越来越突出,即便在德克萨斯州这样的石油与天然气重镇,可再生能源投资的日益增加也创造了巨大的就业市场。”

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Tuesday, September 11, 2018

ब तक जारी किए गए केंद्रीय असेंबली के ग़ैर-सर

0 बजे - अब तक जारी किए गए केंद्रीय असेंबली के ग़ैर-सरकारी परिणामों में पीटीआई को 20, पीएमल नवाज़ को छह, पीपीपी को चार और अन्य पार्टियों को तीन सीटें मिली हैं.
13:10 बजे: पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री चौधरी निसार चुनाव हार गए हैं. वह निर्दलीय तौर पर रावलपिंडी से केंद्रीय असेंबली की एनए 59 सीट से उम्मीवार थे. ग़ैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चौधरी निसार को 66369 वोट मिले हैं जबकि उनके मुक़ाबले पीटीआई के उम्मीदवार को 89055 वोट मिले हैं.
इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की आम चुनावों में बढ़त पर इमरान की पूर्व पत्नी जेमाइमा गोल्डस्मिथ ने ट्वीट कर उन्हें बधाई दी है.
उन्होंने ट्वीट किया, "अपमान, बाधाओं और बलिदान के 22 सालों बाद मेरे बेटे के पिता पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री हैं. ये दृढ़ता, भरोसा और हार न मानने का अविश्वसनीय उदाहरण है. अब चुनौती यह याद रखना है कि वह राजनीति में पहले पायदान पर क्यों आए. मुबारक इमरान ख़ान."मरान ख़ान की पार्टी की बढ़त से पाकिस्तान शेयर बाज़ारों में तेज़ी आई है. कराची स्टॉक एक्सचेंज में 700 अंकों का उछाल हुआ है.
12:40 बजे - चार प्रांतीय असेंबली के आए अब तक के ग़ैर-सरकारी परिणामों में ख़ैबर पख़्तूनख़्वां प्रांत में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) को 22, आवामी नेशनल पार्टी (एएनएम), मुत्ताहिद मजलिस-ए-अमल (एमएमए) को दो-दो सीटें मिली हैं.
पंजाब में मुस्लिम लीग नवाज़ के 16, पीटीआई के 12 और दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है.
सिंध में पीपीपी ने पांच और ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायंस ने एक सीट जीती है.
बलूचिस्तान में बलूचिस्तान आवामी पार्टी ने दो और बलूचिस्तान नेशनल पार्टी ने एक सीट जीती है.
12:30 बजे - केंद्रीय असेंबली में पंजाब प्रांत की एनए 166 बहावल नगर सीट पर स्वतंत्र उम्मीदवार मोहम्मद अब्दुल ग़फ़्फ़ार ने पीटीआई सैयद मोहम्मद को हराया है. ग़फ़्फ़ार को 101811 वोट मिले हैं.
11:35 बजे - अब तक आए केंद्रीय असेंबली के ग़ैर-सरकारी नतीज़ों में तहरीक-ए-इंसाफ़ ने 10, मुस्लिम लीग नवाज़ और पीपल्स पार्टी ने तीन-तीन और अन्य ने एक सीट जीती है. अब तक आए प्रांतीय असेंबली के ग़ैर-सरकारी परिणामों में ख़ैबर पख़्तूनख़्वां प्रांत में तहरीक-ए-इंसाफ़ ने 15, आवामी नेशनल पार्टी ने 2 और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है.
पंजाब में मुस्लिम लीग नवाज़ ने नौ, तहरीक-ए-इंसाफ़ ने सात सीटों पर जीत दर्ज की है.
सिंध में पीपल्स पार्टी ने सात सीटों पर जीत दर्ज की है.
बलूचिस्तान में बलूचिस्तान आवामी पार्टी ने दो और बलूचिस्तान नेशनल पार्टी ने एक सीट जीती है.
10:47 बजे - चुनाव आयोग द्वारा 10 बजे तक केंद्रीय असेंबली के आए 12 सीटों के ग़ैर-सरकारी परिणामों में पीटीआई आगे है. पीटीआई ने आठ, पीएमल (एन) ने दो और पीपीपी और एमएमए ने एक-एक सीट हासिल की है.
10:45 बजे - हमज़ाह शहबाज़ जीते
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) नवाज़ के प्रमुख शहबाज़ शरीफ़ के बेटे हमज़ाह शहबाज़ शरीफ़ ने केंद्रीय असेंबली की सीट 124 से जीत हासिल की है. ग़ैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, हमज़ाह शहबाज़ ने कुल 146294 वोट हासिल किए जबकि उनके प्रतिद्ंवद्वी तहरीक-ए-इंसाफ़ के मोहम्मद नोमान क़ैसर को 80981 वोट मिले.
10:30 बजे - चुनाव आयोग ने सुबह नौ बजे तक केंद्रीय असेंबली की सात सीटों के अनौपचारिक परिणाम जारी किए थे. इसमें पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को चार जबकि मुस्लिम लीग नवाज़, पीपल्स पार्टी और मत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल ने एक-एक सीट हासिल की है.
पाकिस्तान में इस वक़्त राष्ट्रीय और प्रांतीय असेंबली के लिए मतगणना जारी है. नीचे ग्राफ़ में देखिए किस-किस इलाक़े में केंद्रीय असेंबली की कितनी सीटें हैं.
मतगणना के रुझानों के अनुसार, 113 सीटों पर बढ़त के साथ पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. वहीं, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) दूसरे और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी तीसरे पायदान पर है.लाहौर और रावलपिंडी की सड़कों पर पीटीआई समर्थक जश्न मनाने उतर आये हैं. पाकिस्तान में ट्विटर पर
मुस्लिम लीग नवाज़ पार्टी ने चुनाव आयोग पर साज़िश और धांधली के आरोप लगाये हैं. हालांकि मुख्य चुनाव अधिकारी सरदार रज़ा ख़ान ने सभी आरोपों और आलोचनाओं को ख़ारिज कर दिया है.
हालांकि, ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में हमेशा लोकतांत्रिक सरकार रही है. कभी यहां सैन्य शासन रहा है तो कभी नागरिक शासन रहा है.
बुधवार शाम 6 बजे मतदान ख़त्म हुआ था. इसके बाद क़रीब 8 बजे मतों की गिनती शुरू हुई थी.
लेकिन पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने गुरुवार तड़के लगभग साढ़े 4 बजे पहले आधिकारिक नतीजे की घोषणा कि जो रावलपिंडी से पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के उम्मीदवार चौधरी मोहम्मद अदनान के हक़ में गया है.
  • संसदीय सीटों पर हुआ मतदान, इनमें से 70 सीटें महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं.
  • चुनाव में 95 पार्टियों के 11,676 उम्मीदवार मैदान में थे.
  • पाकिस्तान के चारों सूबों और केंद्रीय राजधानी के इलाक़े को मिलाकर रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या क़रीब 10 करोड़ 59 लाख है.
  • स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़, क़रीब 50 फ़ीसदी मतदाताओं ने आम चुनाव में वोट दिया.
  • पाकिस्तान में मतदान की सुरक्षा और तालिबान के ख़तरे के मद्देनज़र 3 लाख 70 हज़ार सेना के जवानों को ड्यूटी पर लगाया गया था.
  • हालांकि, मतदान के दिन क्वेटा में हुए हमले में कुल 31 लोगों की मौत हुई.