हालांकि 2019 में चुनाव से पहले नीतीश कुमार को अपनी जाति कुर्मी और कुशवाहा यानी 'लव-कुश' का करीब 10 फीसदी वोट भी मिलता रहा था.
लेकिन 2019 में कई वजहों से ये माना जा रहा है कि नीतीश कुमार का अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है. एक तो उनके लव-कुश फैक्टर को उपेंद्र कुशवाहा ने सेंध लगाई है. हालांकि इसमें कुशवाहा खुद बड़े पैमाने पर कामयाब नहीं हुए हैं लेकिन हर सीट पर इस वोट बैंक में बिखराव दिखा है.
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "कुशवाहा और यादवों की आपस में जमीनी स्तर पर नहीं बनती है, लेकिन इस बार कुशवाहा और यादव एकसाथ हुए हैं और इसका असर असली नतीजों पर देखने को मिलेगा."
इस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ही महागठबंधन ने भी चार कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं जनता दल यूनाइटेड ने इस बार तीन कुशवाहा उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.
नीतीश कुमार अपनी जाति के उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को केवल नालंदा में टिकट दे पाए. बिहार के चुनाव में यह इकलौता कुर्मी उम्मीदवार है. बावजूद इसके कुर्मियों का वोट नीतीश कुमार को ही मिल रहा है.
नीतीश की पार्टी ने बिहार में अपनी पार्टी की ओर से पांच अत्यंत पिछड़ी जाति के उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है. इस एक कदम से उन्होंने बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय को एक साथ रखने की कोशिश जरूर की है, वहीं महागठबंधन ने चार जगहों पर अत्यंत पिछड़ों को टिकट दिया है.
असली मुक़ाबला इसी जमात के वोट बैंक को अपने हिस्से में करना है. हालांकि इस जमात में कई लोगों का समर्थन अभी भी नीतीश कुमार के पक्ष में दिखाई पड़ता है. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल की कोशिश इसी वोट बैंक में अपना दायरा बढ़ाने की है.
इसके अलावा नीतीश कुमार को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा है, एक तो 2014 में जब वे अकेले चुनाव लड़े थे तब उन्हें कई जगहों पर मुसलमानों का वोट भी मिला था, लेकिन इस बार उनके बीजेपी के साथ होने के चलते उन्हें मुसलमानों का समर्थन मिल पाया होगा, इसमें संदेह है.
इसके अलावा बिहार में नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति भी बहुत कामयाब नहीं हुई है. एक अच्छी नीयत के साथ शुरू की गई ये योजना पूरी तरह से नाकाम हो गई. शराबबंदी के चलते बिहार की जेलों में भी बड़ी संख्या में लोग हैं.
पटना के आम मतदाता गोपाल चौधरी कहते हैं, "शराबबंदी का आलम तो यह है कि लंबी-लंबी गाड़ी में चलने वाले लोगों के गाड़ी और घर पर शराब पहुंचाई जा रही है और ग़रीब आदमी, रिक्शा ठेला चलाने वाला तुरंत में गिरफ्तार कर लिया जाता है."
नीतीश कुमार के राज्य में बिहार में बिजली, सड़क और पानी की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, ख़ासकर मध्य बिहार के हिस्सों में नीतीश ने कुछ ज़्यादा ध्यान दिया है. लेकिन शासन व्यवस्था अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
नालंदा से महागठबंधन के उम्मीदवार चंद्रवंशी अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार जी के किस सुशासन की बात आप कर रहे हैं, दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं, अपराध कहीं से कम नहीं हुआ है. लेकिन ये मीडिया को दिखता नहीं है."
इन सबके बावजूद नीतीश कुमार बिहार में बीजेपी के स्वभाविक सहयोगी नजर आते हैं. बीजेपी के महासचिव और बिहार राज्य के प्रभारी भूपेंद्र यादव कहते भी हैं, " नीतीश कुमार और बीजेपी का साथ बेहद पुराना और जमीनी स्तर पर काफी मज़बूत है." दरअसल, नीतीश कुमार की अपनी राजनीति बीजेपी से भले अलग दिखने की रही हो लेकिन उनके साथ से बीजेपी बिहार में जीत हासिल करने की स्थिति में पहुंच पाती है.
यही वजह है कि बीजेपी से जब तब नीतीश के नाराज होने की ख़बरें आती रही हों लेकिन बीजेपी अपनी ओर से नीतीश को साथ रखने में भरोसा करती है. इसके लिए पार्टी अपनी जीती हुई पांच लोकसभा की सीटें भी छोड़ देती है. क्योंकि उसे मालूम है कि बिहार में आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन को हराने के लिए उसे नीतीश कुमार का सहारा चाहिए. इसमें नीतीश कुमार का भी फ़ायदा होता रहा है.
नालंदा के युवा राजद अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "नीतीश कुमार खुद अवधिया कुर्मी हैं. उसके मतदाताओं की संख्या नालंदा में भी 15 हज़ार से ज़्यादा नहीं है. आप देखिए केवल इस वोट बैंक के सहारे वे 14 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. बीजेपी की मदद से ही तो वे इस मुकाम तक पहुंचे जहां से कुर्मी ही नहीं बल्कि अत्यंत पिछड़े समुदाय के नेता को तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है."
हालांकि 2019 के चुनाव में बीजेपी- जेडीयू गठबंधन को बढ़त मिलती है तो बिहार में नीतीश कुमार को 2020 के विधानसभा तक कोई चुनौती नहीं मिलेगी. लेकिन अगर इस चुनाव में उनकी पार्टी को कम सीटें मिलीं तो फिर उनके नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे.
लेकिन 2019 में कई वजहों से ये माना जा रहा है कि नीतीश कुमार का अपना वोट बैंक प्रभावित हो रहा है. एक तो उनके लव-कुश फैक्टर को उपेंद्र कुशवाहा ने सेंध लगाई है. हालांकि इसमें कुशवाहा खुद बड़े पैमाने पर कामयाब नहीं हुए हैं लेकिन हर सीट पर इस वोट बैंक में बिखराव दिखा है.
शिवानंद तिवारी कहते हैं, "कुशवाहा और यादवों की आपस में जमीनी स्तर पर नहीं बनती है, लेकिन इस बार कुशवाहा और यादव एकसाथ हुए हैं और इसका असर असली नतीजों पर देखने को मिलेगा."
इस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ही महागठबंधन ने भी चार कुशवाहा उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं जनता दल यूनाइटेड ने इस बार तीन कुशवाहा उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.
नीतीश कुमार अपनी जाति के उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार को केवल नालंदा में टिकट दे पाए. बिहार के चुनाव में यह इकलौता कुर्मी उम्मीदवार है. बावजूद इसके कुर्मियों का वोट नीतीश कुमार को ही मिल रहा है.
नीतीश की पार्टी ने बिहार में अपनी पार्टी की ओर से पांच अत्यंत पिछड़ी जाति के उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है. इस एक कदम से उन्होंने बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय को एक साथ रखने की कोशिश जरूर की है, वहीं महागठबंधन ने चार जगहों पर अत्यंत पिछड़ों को टिकट दिया है.
असली मुक़ाबला इसी जमात के वोट बैंक को अपने हिस्से में करना है. हालांकि इस जमात में कई लोगों का समर्थन अभी भी नीतीश कुमार के पक्ष में दिखाई पड़ता है. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल की कोशिश इसी वोट बैंक में अपना दायरा बढ़ाने की है.
इसके अलावा नीतीश कुमार को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा है, एक तो 2014 में जब वे अकेले चुनाव लड़े थे तब उन्हें कई जगहों पर मुसलमानों का वोट भी मिला था, लेकिन इस बार उनके बीजेपी के साथ होने के चलते उन्हें मुसलमानों का समर्थन मिल पाया होगा, इसमें संदेह है.
इसके अलावा बिहार में नीतीश कुमार की शराबबंदी नीति भी बहुत कामयाब नहीं हुई है. एक अच्छी नीयत के साथ शुरू की गई ये योजना पूरी तरह से नाकाम हो गई. शराबबंदी के चलते बिहार की जेलों में भी बड़ी संख्या में लोग हैं.
पटना के आम मतदाता गोपाल चौधरी कहते हैं, "शराबबंदी का आलम तो यह है कि लंबी-लंबी गाड़ी में चलने वाले लोगों के गाड़ी और घर पर शराब पहुंचाई जा रही है और ग़रीब आदमी, रिक्शा ठेला चलाने वाला तुरंत में गिरफ्तार कर लिया जाता है."
नीतीश कुमार के राज्य में बिहार में बिजली, सड़क और पानी की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, ख़ासकर मध्य बिहार के हिस्सों में नीतीश ने कुछ ज़्यादा ध्यान दिया है. लेकिन शासन व्यवस्था अभी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
नालंदा से महागठबंधन के उम्मीदवार चंद्रवंशी अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार जी के किस सुशासन की बात आप कर रहे हैं, दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं, अपराध कहीं से कम नहीं हुआ है. लेकिन ये मीडिया को दिखता नहीं है."
इन सबके बावजूद नीतीश कुमार बिहार में बीजेपी के स्वभाविक सहयोगी नजर आते हैं. बीजेपी के महासचिव और बिहार राज्य के प्रभारी भूपेंद्र यादव कहते भी हैं, " नीतीश कुमार और बीजेपी का साथ बेहद पुराना और जमीनी स्तर पर काफी मज़बूत है." दरअसल, नीतीश कुमार की अपनी राजनीति बीजेपी से भले अलग दिखने की रही हो लेकिन उनके साथ से बीजेपी बिहार में जीत हासिल करने की स्थिति में पहुंच पाती है.
यही वजह है कि बीजेपी से जब तब नीतीश के नाराज होने की ख़बरें आती रही हों लेकिन बीजेपी अपनी ओर से नीतीश को साथ रखने में भरोसा करती है. इसके लिए पार्टी अपनी जीती हुई पांच लोकसभा की सीटें भी छोड़ देती है. क्योंकि उसे मालूम है कि बिहार में आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन को हराने के लिए उसे नीतीश कुमार का सहारा चाहिए. इसमें नीतीश कुमार का भी फ़ायदा होता रहा है.
नालंदा के युवा राजद अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "नीतीश कुमार खुद अवधिया कुर्मी हैं. उसके मतदाताओं की संख्या नालंदा में भी 15 हज़ार से ज़्यादा नहीं है. आप देखिए केवल इस वोट बैंक के सहारे वे 14 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं. बीजेपी की मदद से ही तो वे इस मुकाम तक पहुंचे जहां से कुर्मी ही नहीं बल्कि अत्यंत पिछड़े समुदाय के नेता को तौर पर उन्होंने खुद को स्थापित किया है."
हालांकि 2019 के चुनाव में बीजेपी- जेडीयू गठबंधन को बढ़त मिलती है तो बिहार में नीतीश कुमार को 2020 के विधानसभा तक कोई चुनौती नहीं मिलेगी. लेकिन अगर इस चुनाव में उनकी पार्टी को कम सीटें मिलीं तो फिर उनके नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे.