Tuesday, November 6, 2018

प्रशासन के ज़रिए नियंत्रण के प्रयास

दरअसल, हिंदी पट्टी में बिहार एक ऐसा क़िला बना हुआ है जिसे बीजेपी अपने बलबूते फ़तह नहीं कर पाई है. बिहार ही एक ऐसा राज्य है, जहाँ बीजेपी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है.
जानकार कहते हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्मशान और क़ब्रिस्तान का सवाल उठाकर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की और इसमें काफ़ी हद तक सफल भी रहे.
पटना में पीटीआई के ब्यूरो चीफ़ नचिकेता नारायण कहते हैं, "भाजपा बिहार में दूसरे दर्जे के प्लेयर की भूमिका में है. भाजपा चाहती है कि वो अन्य राज्यों की तरह या तो अपने बूते पर या सीनियर पार्टनर के रूप में सरकार में आए."
1989 के भागलपुर दंगों और फिर इस साल रामनवमी के आसपास हिंसा प्रभावित इलाक़ों में काम कर चुके सामाजिक कार्यकर्ता उदय कहते हैं, "ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी की टॉप लीडरशिप की भी प्लानिंग होती है. किस मुद्दे को छोड़ें, किसको पकड़ें- इन सबकी तैयारी होती है. इन्हें पता होता है कि कब गाय का मुद्दा लाना है और कब मंदिर का. एक वर्ष एक घटना घटती है, तो दूसरे वर्ष दूसरी. कभी हिंदू नववर्ष के नाम पर तो कभी रामनवमी के नाम पर. ये अलग-अलग प्रतीकों को चुनते हैं, अलग-अलग तिथियों को चुनते हैं."
केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे और भागलपुर के दंगे में भूमिका वजह से गिरफ़्तार हो चुके अर्जित चौबे ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा, "भारत माँ की झाँकी इस देश में निकालने की अनुमति नहीं है, तो कहाँ है. अपने देश में हम वंदे मातरम भी नहीं गा सकते? इस देश में राम और कृष्ण का जयकारा नहीं करेंगे तो कहाँ करेंगे? भारत मां की प्रतिष्ठा विश्व में बने, इसका प्रयास चल रहा है."
एक और बात जो विहिप, आरएसएस, बजरंग दल और बीजेपी नेताओं में कॉमन है, वो है हिंदुत्व की परिभाषा, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा और देश के मुसलमानों को सुधर जाने की सलाह.
अर्जित चौबे कहते हैं, "हिंदुत्व जीवन जीने का तरीक़ा है. हिंदू शब्द पर जो राजनीति शुरू हुई है, वो काफ़ी दुर्भाग्यपूर्ण है. देश में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है. मुसलमान भी हिंदू है. भारत माता की वंदना करना कौन मुसलमान बोलता है कि ग़लत बात है. वंदे मातरम राष्ट्रगीत भी है और संवैधानिक भी है."
भागलपुर में आरएसएस के शीर्ष अधिकारी रह चुके सुबोध विश्वकर्मा कहते हैं, "जीने की पद्धति है हिंदुत्व. मुसलमान भूतपूर्व हिंदू हैं. मुसलमानों को बताना पड़ेगा, समझना पड़ेगा कि वे हिंदू हैं. 18 करोड़ मुसलमानों को समुद्र में तो नहीं फेंक सकते. शक और हूण की तरह अपने आप में समाहित कर सकते हैं."
भागलपुर से कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा विधानसभा चुनाव में सुर्ख़ियों में रहे. उन्होंने अर्जित शाश्वत चौबे को मात दी थी. लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहे अजीत शर्मा का कहना है कि "जब-जब बीजेपी को लगता है कि उसके वोटों में कमी आ रही है और जीतने की संभावना नहीं है, वो जान-बूझकर दोनों समुदायों में आग लगाने की कोशिश करती है".
आशंका और भय आम आदमी में भी है. लोगों को लगता है कि बिहार के सियासी घमासान में कहीं आने वाले दिनों में सांप्रदायिक दरार और चौड़ी न हो जाए.
नवादा में नवरात्रि के मौक़े पर मंदिरों में भारी भीड़ है. कई जगह मुख्य सड़कों को आवाजाही के लिए बंद कर दिया गया है. मुस्लिम आबादी के बीच ऐसे ही एक मंदिर के पास अपने घर पर हमें मिले फ़ख़रुद्दीन अली अहमद.
उनकी नाराज़गी अपने सांसद गिरिराज सिंह से है. वे कहते हैं, "मैं गिरिराज सिंह से ये कहना चाहता हूँ कि वे सभी लोगों के प्रतिनिधि हैं इसलिए मुस्लिम समाज को अछूता न समझा जाए. मुस्लिम समाज को भी लेकर चला जाए. इस तरह का माहौल पैदा किया जा रहा है, मुस्लिम समाज को दरकिनार किया जा रहा है ताकि सांप्रदायिक दंगा फैले और हिंदू समाज के वोटर उनके पक्ष में हो जाएँ और वो 2019 में आराम से चुनाव जीत जाएँ."
औरंगाबाद की चिलचिलाती धूप में ग़ुस्से से लाल एक मुस्लिम युवक ख़ालिद कहते हैं, "यहाँ के लोगों से कोई शिकायत नहीं है. बाहरी लोगों ने आकर यहाँ तांडव किया. वे दंगा कराना चाहते है, हिंदू-मुसलमानों में लड़ाई करना चाहते हैं, वोट बटोरना चाहते हैं."
भागलपुर के जोगिंदर यादव मुसलमानों के खेतों में काम करते हैं और उन्हें पीड़ा है कि इन सबके बीच निर्दोष लोग पिस जाते हैं और उनके जैसे लोग रोज़गार के लिए तरस जाते हैं.
महागठबंधन को छोड़कर एनडीए में आए नीतीश कुमार की मजबूरी पर तो चर्चा है ही, साथ ही इस पर भी चर्चा है कि जब बिहार के कई ज़िले दंगे की आग में झुलस रहे थे, नीतीश कुमार ने चुप्पी क्यों साध रखी थी?
नीतीश कुमार की मजबूरी और बीजेपी की बिहार में बढ़ती महत्वाकांक्षा के बीच सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाएँ प्रदेश को किस ओर ले जा रही हैं?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्षता की छवि को बड़े ज़ोर-शोर से पेश करते हैं. राज्य में मुसलमानों को लेकर उनकी कई कल्याणकारी योजनाएँ हैं, जिनका ढोल वे गाहे-बगाहे पीटते रहते हैं, लेकिन बीजेपी नेताओं के भड़काऊ बयान और हिंदू संगठनों की सक्रियता ने उन्हें ऊहापोह में डाल रखा है.
पटना में पीटीआई के ब्यूरो चीफ़ नचिकेता नारायण कहते हैं, "जब पहली बार नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हुए, उसी समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह का आक्रामक नेतृत्व भाजपा में उभरा, उसके बाद यह बात सामने आ रही थी कि भाजपा अपने दम पर अपना फैलाव करने की कोशिश करेगी. इस बार भाजपा नीतीश की छत्रछाया में रहने में ही संतोष नहीं करेगी. वो अपना हिंदुत्व का एजेंडा बढ़ाने की कोशिश करेगी."
लेकिन नीतीश कुमार की दुविधा ये भी है कि वे अपनी धर्मनिरपेक्षता की छवि से समझौता नहीं करना चाहते और न ही मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में बीजेपी का ही दामन छोड़ने की हालत में हैं.
तो नीतीश कुमार के सामने क्या विकल्प हैं, नचिकेता नारायण कहते हैं, "नीतीश कुमार के लिए यही चारा है कि वे भाजपा के साथ बने रहें. साथ ही प्रशासन या ब्यूरोक्रेसी पर जो पकड़ है, उसके माध्यम से ऐसी घटनाओं को जहाँ तक संभव हो रोकें."

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