Tuesday, September 11, 2018

ब तक जारी किए गए केंद्रीय असेंबली के ग़ैर-सर

0 बजे - अब तक जारी किए गए केंद्रीय असेंबली के ग़ैर-सरकारी परिणामों में पीटीआई को 20, पीएमल नवाज़ को छह, पीपीपी को चार और अन्य पार्टियों को तीन सीटें मिली हैं.
13:10 बजे: पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री चौधरी निसार चुनाव हार गए हैं. वह निर्दलीय तौर पर रावलपिंडी से केंद्रीय असेंबली की एनए 59 सीट से उम्मीवार थे. ग़ैर-सरकारी आंकड़ों के अनुसार, चौधरी निसार को 66369 वोट मिले हैं जबकि उनके मुक़ाबले पीटीआई के उम्मीदवार को 89055 वोट मिले हैं.
इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) की आम चुनावों में बढ़त पर इमरान की पूर्व पत्नी जेमाइमा गोल्डस्मिथ ने ट्वीट कर उन्हें बधाई दी है.
उन्होंने ट्वीट किया, "अपमान, बाधाओं और बलिदान के 22 सालों बाद मेरे बेटे के पिता पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री हैं. ये दृढ़ता, भरोसा और हार न मानने का अविश्वसनीय उदाहरण है. अब चुनौती यह याद रखना है कि वह राजनीति में पहले पायदान पर क्यों आए. मुबारक इमरान ख़ान."मरान ख़ान की पार्टी की बढ़त से पाकिस्तान शेयर बाज़ारों में तेज़ी आई है. कराची स्टॉक एक्सचेंज में 700 अंकों का उछाल हुआ है.
12:40 बजे - चार प्रांतीय असेंबली के आए अब तक के ग़ैर-सरकारी परिणामों में ख़ैबर पख़्तूनख़्वां प्रांत में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) को 22, आवामी नेशनल पार्टी (एएनएम), मुत्ताहिद मजलिस-ए-अमल (एमएमए) को दो-दो सीटें मिली हैं.
पंजाब में मुस्लिम लीग नवाज़ के 16, पीटीआई के 12 और दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है.
सिंध में पीपीपी ने पांच और ग्रैंड डेमोक्रेटिक अलायंस ने एक सीट जीती है.
बलूचिस्तान में बलूचिस्तान आवामी पार्टी ने दो और बलूचिस्तान नेशनल पार्टी ने एक सीट जीती है.
12:30 बजे - केंद्रीय असेंबली में पंजाब प्रांत की एनए 166 बहावल नगर सीट पर स्वतंत्र उम्मीदवार मोहम्मद अब्दुल ग़फ़्फ़ार ने पीटीआई सैयद मोहम्मद को हराया है. ग़फ़्फ़ार को 101811 वोट मिले हैं.
11:35 बजे - अब तक आए केंद्रीय असेंबली के ग़ैर-सरकारी नतीज़ों में तहरीक-ए-इंसाफ़ ने 10, मुस्लिम लीग नवाज़ और पीपल्स पार्टी ने तीन-तीन और अन्य ने एक सीट जीती है. अब तक आए प्रांतीय असेंबली के ग़ैर-सरकारी परिणामों में ख़ैबर पख़्तूनख़्वां प्रांत में तहरीक-ए-इंसाफ़ ने 15, आवामी नेशनल पार्टी ने 2 और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की है.
पंजाब में मुस्लिम लीग नवाज़ ने नौ, तहरीक-ए-इंसाफ़ ने सात सीटों पर जीत दर्ज की है.
सिंध में पीपल्स पार्टी ने सात सीटों पर जीत दर्ज की है.
बलूचिस्तान में बलूचिस्तान आवामी पार्टी ने दो और बलूचिस्तान नेशनल पार्टी ने एक सीट जीती है.
10:47 बजे - चुनाव आयोग द्वारा 10 बजे तक केंद्रीय असेंबली के आए 12 सीटों के ग़ैर-सरकारी परिणामों में पीटीआई आगे है. पीटीआई ने आठ, पीएमल (एन) ने दो और पीपीपी और एमएमए ने एक-एक सीट हासिल की है.
10:45 बजे - हमज़ाह शहबाज़ जीते
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) नवाज़ के प्रमुख शहबाज़ शरीफ़ के बेटे हमज़ाह शहबाज़ शरीफ़ ने केंद्रीय असेंबली की सीट 124 से जीत हासिल की है. ग़ैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, हमज़ाह शहबाज़ ने कुल 146294 वोट हासिल किए जबकि उनके प्रतिद्ंवद्वी तहरीक-ए-इंसाफ़ के मोहम्मद नोमान क़ैसर को 80981 वोट मिले.
10:30 बजे - चुनाव आयोग ने सुबह नौ बजे तक केंद्रीय असेंबली की सात सीटों के अनौपचारिक परिणाम जारी किए थे. इसमें पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को चार जबकि मुस्लिम लीग नवाज़, पीपल्स पार्टी और मत्ताहिदा मजलिस-ए-अमल ने एक-एक सीट हासिल की है.
पाकिस्तान में इस वक़्त राष्ट्रीय और प्रांतीय असेंबली के लिए मतगणना जारी है. नीचे ग्राफ़ में देखिए किस-किस इलाक़े में केंद्रीय असेंबली की कितनी सीटें हैं.
मतगणना के रुझानों के अनुसार, 113 सीटों पर बढ़त के साथ पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. वहीं, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) दूसरे और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी तीसरे पायदान पर है.लाहौर और रावलपिंडी की सड़कों पर पीटीआई समर्थक जश्न मनाने उतर आये हैं. पाकिस्तान में ट्विटर पर
मुस्लिम लीग नवाज़ पार्टी ने चुनाव आयोग पर साज़िश और धांधली के आरोप लगाये हैं. हालांकि मुख्य चुनाव अधिकारी सरदार रज़ा ख़ान ने सभी आरोपों और आलोचनाओं को ख़ारिज कर दिया है.
हालांकि, ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में हमेशा लोकतांत्रिक सरकार रही है. कभी यहां सैन्य शासन रहा है तो कभी नागरिक शासन रहा है.
बुधवार शाम 6 बजे मतदान ख़त्म हुआ था. इसके बाद क़रीब 8 बजे मतों की गिनती शुरू हुई थी.
लेकिन पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने गुरुवार तड़के लगभग साढ़े 4 बजे पहले आधिकारिक नतीजे की घोषणा कि जो रावलपिंडी से पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के उम्मीदवार चौधरी मोहम्मद अदनान के हक़ में गया है.
  • संसदीय सीटों पर हुआ मतदान, इनमें से 70 सीटें महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं.
  • चुनाव में 95 पार्टियों के 11,676 उम्मीदवार मैदान में थे.
  • पाकिस्तान के चारों सूबों और केंद्रीय राजधानी के इलाक़े को मिलाकर रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या क़रीब 10 करोड़ 59 लाख है.
  • स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़, क़रीब 50 फ़ीसदी मतदाताओं ने आम चुनाव में वोट दिया.
  • पाकिस्तान में मतदान की सुरक्षा और तालिबान के ख़तरे के मद्देनज़र 3 लाख 70 हज़ार सेना के जवानों को ड्यूटी पर लगाया गया था.
  • हालांकि, मतदान के दिन क्वेटा में हुए हमले में कुल 31 लोगों की मौत हुई.

Friday, September 7, 2018

र ने खेती के लिए साहूकारों से लेकर माइक्रो फ़ा

भास्कर ने खेती के लिए साहूकारों से लेकर माइक्रो फ़ाइनेंस कंपनियों तक से कर्ज़ा लिया. ज़मीन किराए पर ली. फिर मज़दूरों, कीटनाशक और खाद पानी का ख़र्च मिलकर उनके 1.5 लाख रुपये निवेश में लग गए.
“दाम ठीक नहीं मिला. फ़सल निकली तो सिर्फ़ 90 हज़ार मिले 6 एकड़ में उपजी मूँगफली की फ़सल के. मुझे 90 हज़ार का नुक़सान हो गया. फिर भी हमने अगले मौसम में हिम्मत करके कपास उगाया. फ़सल अच्छी हुई लेकिन ठीक काटने से पहले उसमें बोंदड़ी (पिंक पेस्ट नामक कपास में लगने वाला कीड़ा) लग गयी. हमारी खड़ी फ़सल ख़राब हो गयी”.
दो-दो फ़सलें ख़राब होने के बाद भास्कर के घर में उदासी छा गयी. लगातार रोने से उनकी लाल हो चुकी आँखों में अब भी आंसू भरे थे. “हम मेहनत करने वाले किसान हैं मैडम. शरीर तोड़ मेहनत करते हैं, फिर भी कर्ज़ लेना पड़ा. एक तो कर्ज़ा देने वाले घर आने लगे और दूसरी तरफ़ फ़सलें ख़राब हो गईं. दाम नहीं मिले. घाटा लग गया और एक के बाद एक मेरे दो बच्चों ने आत्महत्या कर ली. जब मेरे बच्चे मरे, तब हम पर ढाई लाख का कर्ज़ा था. इसलिए इस साल दुखी होकर मैंने कोई फ़सल ही नहीं उगाई”.
भास्कर का परिवार खेती में होने वाले नुकसान का किसान परिवार पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों का सटीक उदाहरण हैं. खेती में नुक़सान के बेटियों की शादी पर पड़े प्रभाव के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, “बड़ी बेटी को देखने रिश्ते वाले मेहमान आते रहते थे. कई बार बात तय भी हो जाती लेकिन हम हमेशा क़र्ज़ में डूबे रहते. कुछ नहीं तो मेहमानों को सदा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था. इतने भी पैसे नहीं बनते थे. कहां से करते शादी?
रिश्तेदार सब कहने लगे थे कि दो-दो जवान बेटियां घर में हैं. मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं. बस एक दिन अचानक चली गयीं”.
देवकू और भास्कर के दो बेटे हैं लेकिन खेती और घर से जुड़ा सारा आर्थिक व्यवहार स्वाति ही संभालती थी. परिवार बेटों को पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था इसलिए वह खेती में कभी शामिल नहीं हुए.
परिवार के लोग बताते हैं कि माधुरी और स्वाति में बहुत प्यार था. बड़ी बहन के जाने के बाद स्वाति सदमे में रहने लगी.
“स्वाति स्कूल ख़त्म कर आगे डिप्लोमा की पढ़ाई करने वाली थी. फ़िलहाल घर में सबसे पढ़ी लिखी वही थी. इसलिए सारा व्यवहार वही रखती. किसका कितना कर्ज़ा है, किसको कितना उधार चुकाना है – सब उसे मालूम था. मैं जो भी कमाता, सारे पैसे उसी के हाथ में देता. उसकी भी शादी की बात चल रही थी लेकिन पैसों की वजह से शादी तय नहीं हो पा रही थी.
माधुरी के बाद उसपर काम का बोझ भी बढ़ गया. खेतों में काम भी करती, घर का काम भी और हिसाब किताब भी. वो परेशान तो थी पर इतना टूट जाएगी की ख़ुद अपनी जान ले लेगी, ऐसा हमने सपने में भी नहीं सोचा था.”
माधुरी और स्वाति की मौत के बाद तिवसा के तहसीलदार भास्कर के घर आए थे. वह मौत की तारीखें और दूसरी ज़रूरी जानकारियां भी नोट करके ले गए लेकिन उन्हें अब तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है.
भास्कर के बेटे सागर का मानना है कि भारत के किसानों को अब खेती छोड़ देनी चाहिए. चेहरे पर किसी उजड़े शहर जैसे उदासी लिए वह कहते हैं, “हमारी बहनें हमें माँ से भी ज़्यादा प्यार करती थीं.
लेकिन खेती में हुए नुक़सान और कर्ज़ की वजह से उन्होंने सुसाइड कर लिया. इस देश में किसानों की कोई इज़्ज़त ही नहीं है. 70 हज़ार ज़मीन में डालो तब 45 हज़ार वापस मिलता है. हर फ़सल पर इतना नुकसान किसान कैसे सहेगा? ऐसे आत्महत्या करके मरने से तो अच्छा है कि किसान खेती करना ही छोड़ दें.”
आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र में वक़्त के साथ किसानों के हालात बद से बदतर ही हुए हैं. सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बीते दो दशकों में इस राज्य के 60 हज़ार से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इस साल के शुरुआती 3 महीनों में ही महाराष्ट्र में तक़रीबन  किसान बढ़ते क़र्ज़ और खेती में नुकसान के चलते अपनी जान दे चुके हैं.
राज्य के विदर्भ और मराठवाड़ा इलाके 1995 से ही किसानों की आत्महत्या का भौगोलिक केंद्र रहे हैं.
शेंदुरजना गांव से 10 किलोमीटर दूर स्थित तहसीलदार के दफ़्तर में मुख्य अधिकारी राम. ए. लंके स्वाति और माधुरी के बारे में पूछे जाने पर व्यंग्य भरे लहजे में मुस्कुराते हुए कहते हैं, “यहां लोग अपने निजी या पारिवारिक कारणों से आत्महत्या करते हैं. यह सब मीडिया की फैलाई हुई बातें हैं. वरना असल में कर्ज़ और किसानों की आत्महत्या में कोई संबंध नहीं.”
दोबारा कुरेद कर शेंदुरजना की दो बहनों के बारे में पूछने पर वह फ़ाइलें मंगवाकर देखते हैं. वो कहते हैं, “माधुरी को किसान साबित करने के लिए ज़रूरी साक्ष्य मौजूद नहीं थे इसलिए उसके मामले में हम कोई मुआवज़ा नहीं दे सके. लेकिन स्वाति को किसान माना गया है. उनके परिवार को जल्दी ही स्वाति के नाम पर जारी 1 लाख का सरकारी मुआवज़ा दिया जाएगा.”
स्थानीय पत्रकारों से बात करने पर यह भी मालूम चला कि माधुरी की आत्महत्या को एक काल्पनिक प्रेम प्रसंग से जोड़ कर गांव में उड़ाई गई झूठी बेबुनियाद अफ़वाहों ने भी ‘माधुरी को किसान न मानने’ के सरकारी महकमे के निर्णय को प्रभावित करने में अपनी भूमिका निभाई.
तहसीलदार के दफ़्तर से निकलते हुए मुझे अचानक भास्कर की बिलखती ज़बान से पूछा गया वह सवाल याद आ गया जिसने मुझे भी भीतर तक झकझोर दिया था.
“जब मेरी बड़ी बेटी सारी ज़िंदगी दिन-रात मेरे साथ खेतों में काम करती रही, तब भी सरकार ने उसकी आत्महत्या को किसान की आत्महत्या क्यों नहीं माना? अगर उसके मरने के बाद हमें समय पर मुआवज़ा मिल गया होता तो शायद मेरी छोटी बेटी की जान बच सकती थी.”
अमरावती से आगे बढ़ते ही हम यवतमाल पहुंचे. यह समय का व्यंग्य ही है कि महाराष्ट्र का जो यवतमाल ज़िला बीते 2 दशकों से किसान आत्महत्याओं से जूझ रहा है, उसी जिले में जन्मे वसंतराव नाइक न सिर्फ़ 12 वर्षों तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे बल्कि देश में हरित क्रांति के जनक के तौर पर भी पहचाने गए.
अमरावती से यवतमाल के रास्ते में मुझे अक्सर छोटे छोटे गांवों में आज भी शिवाजी के साथ टंगे वसंतराव नाइक की तस्वीरें दिखाई दे जाती. तब एक ख़याल मन में अक्सर उठता, किसने सोचा था कि यवतमाल की जिस हरी-भरी धरती को नाइक किसानों का स्वर्ग बनाना चाहते थे, वही यवतमाल एक दिन किसानों की क़ब्रगाह के नाम से पहचाना जाएगा.
यवतमाल के पिपरी बुट्टी गांव में अब तक 42 किसान कर्ज़ और खेती में हुए माली नुकसान की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं. यहीं रहने वाले 30 वर्षीय मोहन प्रहलाद तज़ाणे का घर पहली बार में आपकी नज़र से छूट सकता है. दो बदरंग से कच्चे-पक्के मकानों के बीच मौजूद प्रह्लाद के एक कमरे के छोटे से घर की कच्ची दीवारें इतनी टूटी और जर्जर हैं कि पहली नज़र में आप उसे किसी बड़े मकान का ढह चुका हिस्सा समझ कर आगे बढ़ जाएँगे.
लेकिन घर के भीतर कदम रखते ही गोबर से रंगी गयी कमरे की कच्ची दीवारें, धूल में लिपटे चंद बर्तन और कमरे के बीच में पड़ा एक टूटा बिस्तर – यहां मरने और जीने वालों की तकलीफ़ों भरी ज़िंदगी की गवाही पेश करते हैं.